• Himanshu Jagga
    Posted Sep 19
    काश! कि एक गृहणी की भी सरकार ने तनख्वाह तय की होती..
    _________________

    तुम दिन भर करती क्या हो ...?
    हाँ , मैं सचमुच दिन भर करती भी क्या हूँ?
    मैं एक सामान्य सी गृहणी
    सुबह से शाम तक
    जो बिना किसी शुल्क के बनाये रखती है संतुलन
    सारे परिवार का
    मैं भला करती भी क्या हूँ ..?
    मैं करती क्या हूँ ...

    सुबह उठती हूँ और चकरघिन्नी से
    सारे घर को संभालती हूँ ,यहाँ से वहां तक ,
    इस्तरी किये कपडे जिन्हें निकाल कर
    तुम आसानी से पहन जाते हो
    अपने दफ्तर जाते हुए ..
    और महसूसते हो खुद को लार्ड साहब
    उस वक्त मैं समेट रही होती हूँ,
    एक लम्बी साँस भर कर,
    तुम्हारे और बच्चों के उतर कर फेंके
    इधर उधर कपड़े ...
    मैं करती ही क्या हूँ ...?

    हम बाजार जाते हैं .
    तुम बटुए का बोझ उठाये चलते हो
    और मैं एक खाली झोला मुट्ठी में बांधे
    तुम्हारे पीछे पीछे हो लेती हूँ
    तुम चुकाते हो कीमत
    उन सभी जरुरी सामान की
    जो जीने के लिए हर महीने जरुरी हैं ,
    और मैं उस भरे हुए झोले का बोझ उठाये
    चल पड़ती हूँ संग तुम्हारे
    मैं करती क्या हूँ ...?

    सर्दियों में तुम्हारी पसंद के साग
    और मक्के - बाजरे की रोटी सुविधाओं से पूर्ण रसोई में बनाती हूँ ...
    और तुम्हे खाते हुए देख कर सुख पाती हूँ ,
    मैं करती क्या हूँ ...
    उँगलियाँ दुखती हैं न तुम्हारी
    जब तोड़ते हो गुड की डली कभी अपने हाथों से
    जब ठण्ड में गुड़ की टूटी डेलियां
    गर्म दूध के संग चबाते हो |
    मैं करती ही क्या हूँ ...

    स्कूल से आये बच्चों की दिन भर की
    धमाचौकड़ी से लेकर उनके होमवर्क कराना
    पल पल उनकी और तुम्हारी जरूरतों का ध्यान रखना ...
    मैं करती ही क्या हूँ ...
    कि शाम को जब कभी तुम
    समय पर घर नहीं पहुंचे
    तुम्हारे आने पर रो-रो कर झगड़ती हूँ ..
    कहाँ रहे इतनी देर, क्यों देर हुई ..
    एक फोन कर देते ...
    पर इस झगडे के पीछे मेरी चिंता को
    तुम कभी नहीं समझ सके
    मैं करती ही क्या हूँ ...

    तुमने बड़ी अकड़ और शान से
    एक ही पल में अपने दोस्तों
    और रिस्तेदारों से कह दिया ये मेरा घर हे मेरे बच्चे हे
    उस घर को सजाने में,
    बच्चों को काबिल बनाने में
    मुझे बरसों लगे
    तुम कभी नहीं समझ सके
    मैं दिन भर करती क्या हूँ ??

    ऐसे तमाम प्रश्न हैं जिनका उत्तर
    तुम्हे तब मिल गया होगा
    जब पिछले दो महीने से एक बड़े ऑपरेशन से गुजरने के बाद
    मैं बिस्तर पर हूँ .....
    और तुमने हर उस काम के लिए बाई लगायी हुई है
    जो जीने के लिए जरुरी है ...
    महीने के अंत में
    खाना बनने वाली को
    घर की साफ करने वाली को .
    कपडे धोने वाली को ... प्रेस करने वाले को
    उनके पेमेंट दिए होंगे ...
    उसके बावजूद भी .
    जहाँ जहाँ तक नजर जाती है मेरी
    मैं देख रही हूँ ..
    मेरा घर बिखर गया है ..
    कीमती साज सज्जा पर धूल उतर आई है |
    टेबिल क्लॉथ कब से खिसक कर आड़ा - तिरछा सा
    बस पड़ा है टेबिल पर ...
    सोफे पर रखे कुशन .. जो अब पड़े हुए से दिखते हैं
    फ्रिज भर गया है बचे हुए खाने पीने से
    तुम्हारी ख़ामोशी बढ़ गयी है पहले से भी ज्यादा
    (आखिर मेरी बक बक जो बंद है इन दिनों )
    छोटी बेटी के चेहरे पर एक प्रश्नवाचक चिन्ह चस्पां है
    मम्मा आप कब ठीक होगीं |
    क्या उम्मीद करूँ ??
    कि अब तुम को ये उत्तर मिल गया होगा ----
    कि आखिर
    मैं दिन भर करती क्या हूँ ...???
    काश कि एक गृहणी की भी सरकार ने तनख्वाह तय की होती ..
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  • Himanshu Jagga
    Posted Sep 19
    कयी दिनो से पीठ में बहुत दर्द था
    डाक्टर ने कहा
    अब और
    झुकना मत
    अब और झुकने की
    गुंजाइश नहीं
    तुम्हारी रीढ की हड्डी में गैप आ गया है
    सुनते ही उसे
    हँसी और रोना
    एक साथ आ गया..

    ज़िंदगी में पहली बार
    वह किसी के मुँह से
    सुन रही थी
    ये शब्द ...

    बचपन से ही वह
    घर के बड़े, बूढ़ों
    माता-पिता
    और समाज से
    यही सुनती आई है,
    झुकी रहना...

    औरत के
    झुके रहने से ही
    बनी रहती है गृहस्थी..
    बने रहते हैं संबंध
    प्रेम..प्यार,
    घर परिवार
    वो
    झुकती गई
    भूल ही गई
    उसकी कोई रीढ भी है..
    और ये आज कोई
    कह रहा है
    झुकना मत..

    वह परेशान सी सोच रही है
    कि क्या सच में
    लगातार झुकने से रीढ की हड्डी
    अपनी जगह से
    खिसक जाती हैं
    और उनमें
    खालीपन आ जाता है..

    वह सोच रही है...
    बचपन से आज तक
    क्या क्या खिसक गया
    उसके जीवन से
    बिना उसके जाने समझे...

    उसका खिलंदड़ापन,
    अल्हड़पन
    उसके सपने
    उसका मन
    उसकी चाहत..
    इच्छा,अनिच्छा
    सच
    कितना कुछ खिसक गया
    जीवन से..

    क्या वाकई में औरत की
    रीढ की हड्डी बनाई है भगवान ने
    समझ नहीं आ रहा.....
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  • Himanshu Jagga
    Posted Sep 18
    "क्या मां..तुम भी बच्चों की तरह
    जिद कर रही हो मंदिर जाने की..
    **
    मैं साधना और बच्चे जा रहे हैं
    ना मंदिर..
    वहां रातभर जागरण होगा और
    तुमको पता है ना आजकल मोहल्ले
    में कितनी चोरियां हो रही हैं?

    राजन ने झिड़कते हुए मां को
    कहा और फिर साधना और
    बच्चों को कार में बैठाकर मंदिर
    की ओर चल दिया..
    **
    और इधर मां दरवाजे पर खड़ी
    बस यही सोच रही थी की
    जन्मदायिनी मां की आंखों में आंसू
    देकर उसका बेटा न जाने कौन सी
    मां को मनाने जा रहा है..??
    ##ma 
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  • Himanshu Jagga
    Posted Sep 18
    झुर्रियों को झुठलाना सीख गए
    आंख के तारे आंख दिखाना
    सीख गए..
    जिनको कल बोलना खिखाया
    वो आज चिल्लाना सीख गए...
    **
    कोई सरहद ना थी
    जिनके लिए
    वो हद बतलाना सीख गए...
    **
    सुनाए थे जिनको परियों
    के किस्से
    वो ताने सुनाना सीख गए
    कुछ भी ना था जिनकी हंसी
    से बढकर
    वो आंसू देकर मुस्कुराना
    सीख गए..
    **
    कोई कर्ज नही रखते सिर पर
    हर कर्ज चुकाना सीख गए
    कितना आगे निकल गए वक्त
    की दौड़ में...
    **
    आजकल के बच्चे वृद्धाश्रम
    बनाना सीख गए..!!
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  • Himanshu Jagga
    Posted Sep 18
    बिटिया बड़ी हो गयी
    एक रोज उसने बड़े सहज भाव में
    अपने पिता से पूछा - "पापा, क्या मैंने आपको कभी रुलाया" ?
    !!
    पिता ने कहा -"हाँ "
    उसने बड़े आश्चर्य से पूछा - "कब" ?
    पिता ने बताया - 'उस समय तुम करीब
    एक साल की थीं
    घुटनों पर सरकती थीं
    मैंने तुम्हारे सामने पैसे, पेन और
    खिलौना रख दिया क्योंकि मैं ये देखना चाहता था कि, तुम तीनों में से किसे उठाती हो तुम्हारा चुनाव मुझे बताता
    कि बड़ी होकर तुम किसे अधिक
    महत्व देतीं
    !!
    जैसे पैसे मतलब संपत्ति, पेन मतलब
    बुद्धि और खिलौना मतलब आनंद
    मैंने ये सब बहुत सहजता से लेकिन उत्सुकतावश किया था
    क्योंकि मुझे सिर्फ तुम्हारा चुनाव देखना था
    !!
    तुम एक जगह स्थिर बैठीं टुकुर टुकुर
    उन तीनों वस्तुओं को देख रहीं थीं
    मैं तुम्हारे सामने उन वस्तुओं की दूसरी ओर खामोश बैठा बस तुम्हें ही देख रहा था
    तुम घुटनों और हाथों के बल सरकती आगे बढ़ीं,
    मैं अपनी श्वांस रोके तुम्हें ही देख
    रहा था और क्षण भर में ही तुमने तीनों वस्तुओं को आजू बाजू सरका दिया और उन्हें पार करती हुई आकर सीधे मेरी
    गोद में बैठ गयीं
    !!
    मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि उन तीनों वस्तुओं के अलावा तुम्हारा एक चुनाव
    मैं भी तो हो सकता था
    तभी तुम्हारा तीन साल का भाई आया ओर पैसे उठाकर चला गया,
    !!
    वो पहली और आखरी बार था
    बेटा जब तुमने मुझे रुलाया और बहुत रुलाया...!!
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  • Himanshu Jagga
    Posted Sep 17
    स्त्री सिर्फ तब तक
    तुम्हारी होती है,
    जब तक वो तुमसे
    रूठ लेती है,लड लेती है
    आंसू बहा बहाकर ,
    और दे देती है
    दो चार उलाहना तुम्हे।

    कह देती है
    जो मन में आता है उसके
    बिना सोचे,बेधडक
    लेकिन जब वो देख लेती है
    उसके रूठने का,
    उसके आंसुओं का
    कोई फर्क नहीं है तुम पर
    तो एकाएक वो
    रूठना छोड देती है
    रोना छोड देती है।

    मुस्कुराकर देने लगती है
    जवाब तुम्हारी बातों पर,
    समेट लेती है वो खुद को
    किसी कछुए की तरह
    अपने ही कवच में ,
    और तुम समझ लेते हो
    कि सब कुछ ठीक हो गया है।

    तुम जान ही नही पाते
    कि ये शांत नही है
    मृतप्राय हो चुकी है,
    कहीं न कहीं
    गला घोंट दिया है
    उसने अपनी भावनाओं का ,
    और अब जो तुम्हारे पास है,
    वो तुम्हारी होकर भी
    तुम्हारी नहीं है।

    क्योंकि स्त्री ,
    सिर्फ तब तक
    तुम्हारी होती है
    जब तक….....
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  • Himanshu Jagga
    Posted Sep 17
    एक औरत की कमी तब अखरती है
    जब वो चली जाती है वापस लौट कर नहीं आती

    छत पर लगे जाले व आँगन की धूल
    हटाने में संकोच आता है
    " तुम्हारी ये सफाई " कहने का मौका
    नहीं मिल पाता !!

    एक औरत की कमी तब अखरती है
    जब कालरों की मैल जुटाने में
    पसीना छूट जाता है
    चूडियां साथ में नहीं खनकती
    उसका "मेहनतकश" होना याद आता है !!

    एक औरत की कमी तब अखरती है
    जब घर में देर से आने पर
    रोटियां ठंडी हो जाती है सब्जियों में
    तुम्हारी पसंद का जायका नहीं रहता
    और तुमसे यह कहते नही बनता
    "मुझे ये पसंद नहीं "!!

    एक औरत की कमी तब अखरती है
    जब बच्चा रात को ज़ोर से रोता है
    आप अनमने से उठ जाते हो
    और यह नहीं कह पाते
    "कितनी लापरवाह हो तुम"!!

    एक औरत की कमी तब अखरती है
    जब आप रात में अकेले सोते हैं
    करवट बदलते रहते हैं बगल में
    पर हाथ धरने पर कुछ नहीं मिलता!!

    एक औरत की कमी तब अखरती है
    जब त्यौहारों के मौसम में
    नयी चीज़ों के लिए कोई नहीं लड़ता
    और तुमसे ये कहते नही बनता
    "और पैसे नहीं हैं "!!

    एक औरत की कमी तब अखरती है
    जब आप गम के बोझ तले दबे होते हैं ,
    निपट अकेले रोते हैं
    और आपके आंसू पोंछने वाला कोई नहीं होता
    आप किसी से कुछ नहीं कह पाते
    हाँ, औरत की कमी तब अखरती जरूर है!!
    0 0 10 Lifestyle Read More